Tuesday, October 26, 2010

इंसानी वीर्य सर्वशक्तियों का आधार

तंत्र शास्त्र का वास्तविक और मूल स्वरूप यदि ज्ञात न हो तो इसे जानने में किसी को कठिनाई हो सकती है। इतना ही नहीं तंत्र और उसके फलितार्थों को लेकर दुनिया में अधिकांशत: भ्रांतिपूर्ण धारणाएं भी देखने को मिलती है। जहां तंत्र शास्त्र में कठोर साधना विधानों का प्रतिपादन मिलता है, वहीं वामाचार और पंच मकारों के नाम पर तंत्र में आई उन्मुक्त पाशविकता का प्रोत्साहन एवं समर्थन भी देखा जा सकता है। एक तरफ मिथुन भाव और संभोगरत मुद्राओं के चित्र एवं मूर्तियां तंत्र की घोर भोगलिप्सा को बयान करती हैं, वहीं हठयोग एवं इन्द्रिय भोगों का कठोरतम सर्वस्व त्याग का विधि-विधान तंत्र की चरम पवित्रता एवं तप-त्याग को बयान करते हैं।

महात्मा बुद्ध के अवतरण के पश्चात तंत्र शास्त्र को एक नया आयाम और क्षेत्र मिला। भारतीय तंत्र शास्त्र के मूल तत्व ही आगे चलकर बौद्ध साधना का अंग बने। नोवीं से ग्यारहवीं शताब्दी तक बौद्ध तंत्रों का चीनी और तिब्बती भाषा में अनुवाद हुआ। बौद्ध धर्म की शाखा महायान पुन: तीन शाखाओं- वज्रयान, मंत्रयान एवं सहजयान में बंट गई। महात्मा बुद्ध ने अपने वचनों में पूर्ण पवित्रता एवं ब्रह्मचर्य को अत्यधिक महत्वपूर्ण माना है। इन्द्रिय भोगों को पूर्णता प्राप्ति में सबसे बड़ा अवरोधक बताया है। इसीलिये असली बौद्ध ग्रथों में ब्रह्मचर्य को साधक के लिये सर्वथा अनिवार्य बताया गया है। महात्मा बुद्ध मानते थे कि-

'मनुष्य शरीर स्थित वीर्य अत्यंत ही अमूल्य पदार्थ है। यह वीर्य ही मनुष्य की समस्त शारीरिक, मानसिक एवं आध्यात्मिक शक्तियों का आधार है। इस संचय के अभाव में साधक को आत्मज्ञान की प्राप्ति कभी भी नहीं हो सकती।'