एक परिवार में वे स्वयं, पत्नी और एक सुशील पुत्री थी। उन्हें धार्मिक यात्रा पर जाना था। उन्होंने अपने घर के तीनों दरवाजों पर ताले लगा दिए और चले गए।यात्रा पूर्ण होने के बाद जब वे घर लौटे तो तीनों दरवाजों पर तीन मूर्तियां खड़ी दिखाई दीं। वे सभी चकित हुए कि ये मूर्तियां कहां से आ गईं? उनकी उलझन उस समय और अधिक बढ़ गई जब वे तीनों दरवाजे अपनी चाभियों से नहीं खुले।वे तीनों परेशान हाल परस्पर चर्चा करने लगे कि जब यात्रा पर गए थे, तब किसी भी दरवाजे पर मूर्ति नहीं थी और ताले भी इन्हीं चाभियों से बंद किए थे। ये सब क्या माजरा है?तभी तीनों मूर्तियों ने समवेत स्वर में कहा- देखो, दरवाजे तभी खुलेंगे, जब तुम हममें से किसी एक को ग्रह प्रवेश की अनुमति दोगे। ग्रहस्वामी ने उन तीनों से उनका परिचय पूछा, तो पहली मूर्ति ने कहा- ‘मैं सफलता हूं।’ दूसरी मूर्ति बोली- ‘मैं प्रसन्नता हूं।’ तीसरी ‘प्रेम की मूर्ति थी।’ अब गृहस्वामी अपनी पत्नी व पुत्री से विचार-विमर्श करने लगे कि किस मूर्ति को अंदर ले चलंे? गृहस्वामी बोले- ‘‘मैं सफलता के साथ अंदर जाना पसंद करूंगा क्योंकि जीवन में सफलता के साथ ही प्रसन्नता आती है।’’उनकी बात सुनकर पत्नी ने विरोध किया- ‘‘यह आवश्यक नहीं कि सफलता के साथ प्रसन्नता भी आए। कई बार सफलता परेशानियों का सबब बन जाती है। इसलिए मैं तो प्रसन्नता के साथ भीतर जाने की इच्छा रखती हूं। घर में प्रसन्नता होने पर संपूर्ण माहौल सकारात्मक बना रहता है।’’ पुत्री की पसंद पूछने पर वह बोली- ‘‘मैं तो घर में प्रेम को ले जाना चाहूंगी। क्योंकि जहां प्रेम होगा, वहां प्रसन्नता और सफलता स्वंयमेव आ जाएंगी।’’ तीनों मूर्तियां ने उसकी बात सुनकर स्वीकार में सिर हिलाया और घर में प्रेम की मूर्ति स्थापित हुई। प्रेम के अखंड भाव से घर में रहने पर न केवल प्रसन्नता स्थायी हुई बल्कि परिवार निरंतर सफलता की सीढ़ियां चढ़ता गया। वस्तुत: प्रेम एक ऐसा उदात्त भाव है, जो समस्त प्रतिकूलताओं को अनुकूलताओं में बदलने का सामथ्र्य रखता है और मानव हृदय को सदैव सकारात्मक ऊर्जा से भरा रखता है।